बलौदाबाजार। कसडोल थाना क्षेत्र में कथित सामूहिक दुष्कर्म और ब्लैकमेलिंग से जुड़े मामले ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। एक ओर स्वयं को दलित युवती बताने वाली पीड़िता ने पुलिस अधीक्षक से शिकायत कर आरोप लगाया है कि नौकरी का झांसा देकर उसके साथ दो बार सामूहिक दुष्कर्म किया गया। शिकायत के अनुसार पहली घटना के समय वह नाबालिग थी, जिससे मामला पॉक्सो अधिनियम और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दायरे में भी आ सकता है। दूसरी ओर कसडोल पुलिस ने पूरे मामले को झूठी शिकायत के माध्यम से तीन लाख रुपये की उगाही की साजिश बताते हुए पांच लोगों को गिरफ्तार कर लिया है।
पीड़िता ने अपने आवेदन में आरोप लगाया है कि 24 जून को शिकायत लेकर थाना कसडोल पहुंचने पर उसकी एफआईआर दर्ज नहीं की गई। उसका यह भी आरोप है कि उसे और उसके परिजनों को घंटों थाने में बैठाए रखा गया, दबाव बनाकर पूछताछ की गई तथा जेल भेजने की धमकी दी गई। वहीं विभिन्न सामाजिक एवं स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि युवती को करीब दो दिन और दो रात तक पुलिस की निगरानी में रखकर बयान बदलवाया गया। हालांकि, इन आरोपों की अभी स्वतंत्र रूप से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।







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इधर, थाना कसडोल पुलिस ने 28 जून को जारी प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया कि जांच के दौरान कथित पीड़िता ने स्वयं स्वीकार किया कि दुष्कर्म की कोई घटना नहीं हुई थी और कुछ लोगों ने सरपंच एवं बीडीसी सदस्य को झूठे मामले में फंसाकर तीन लाख रुपये की उगाही की साजिश रची थी। पुलिस ने इस मामले में पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर विभिन्न धाराओं में अपराध दर्ज किया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने कई महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यदि शिकायत में पहली घटना के समय पीड़िता के नाबालिग होने तथा उसके अनुसूचित जाति से संबंधित होने के दावे सही हैं, तो प्रारंभिक स्तर पर पॉक्सो अधिनियम और एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप कार्रवाई की प्रक्रिया अपनाई गई या नहीं, यह जांच का विषय है। वहीं यदि पुलिस का ब्लैकमेलिंग का दावा सही है, तो झूठी शिकायत के विरुद्ध कार्रवाई भी कानून सम्मत होगी।
फिलहाल मामले में दोनों पक्षों के दावे आमने-सामने हैं। ऐसे में यह प्रकरण निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग करता है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि शिकायत में लगाए गए आरोप सही हैं या पुलिस द्वारा उजागर की गई कथित ब्लैकमेलिंग की कहानी। जांच पूरी होने तक किसी भी पक्ष के दावों को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।
बलौदा बाजार से राजेश्वर गिरी की रिपोर्ट
