रायपुर । कल 11 मार्च को छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन विभिन्न सहभागी संगठनों के साथ बूढ़ातालाब रायपुर में धरना प्रदर्शन कर मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपेगा। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक मंडल ने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के दो दशक बाद भी प्रदेश के मेहनतकश आदिवासी, किसान, मजदूर, कर्मचारी वर्ग अपने जायज अधिकारों के लिए संघर्षरत है ।
कांग्रेस सरकार के लगभग 3 वर्ष बीत जाने के बाद भी जनता के मूल सवालों और उनके मुद्दों की लगातार अनदेखी हो रही है l यह कहना गलत नही होगा कि आज की प्रदेश सरकार अपनी पूर्ववर्ती सरकार की नीतियों का ही अनुसरण कर रही है l






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कांग्रेस ने अपने “जनघोषण पत्र” में बस्तर में शांति की स्थापना के गंभीर प्रयासों का वादा किया था परन्तु आज तक इस दिशा में कोई भी प्रयास राज्य सरकार द्वारा नही किए गए l बल्कि इसके विपरीत भाजपा शासन की तरह ही माओवादी समस्या के नाम पर पूरे बस्तर में सैन्यीकरण को तेज किया जा रहा है । सारकेगुडा व एड्समेटा मुठभेड़ों में हुई निर्दोष आदिवासियों की हत्याओं की न्यायायिक जाँच रिपोर्ट पर भी कोई कार्यवाही नही हुई।
संयोजक मंडल ने आरोप लगाते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ का लगभग 60% इलाका पांचवी अनुसूची में है, वाबजूद इसके यहाँ निवासरत आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण के लिए राज्य सरकार ने कोई भी कदम नही उठाये l विपक्ष में रहते हुए खनिज संसाधनों की लूट का छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने मुखरता से विरोध किया, कोयला खनन में अडानी जैसे समूहों के MDO अनुबंधों को हजारों करोड़ का घोटाला बताया गया l परन्तु सत्ता में आकर इन मुद्दों पर न सिर्फ चुप्पी साध ली गयी, बल्कि नए MDO अनुबंध इन्ही कार्पोरेट समूहों के साथ किए गए l
बिना ग्रामसभा सहमति के कोल बेयरिंग एक्ट से भूमि अधिग्रहण जैसे मामलो पर भी राज्य सरकार हस्तक्षेप करने से बच रही है, जबकि यह प्रक्रिया यूपीए सरकार में बने पेसा, वनाधिकार मान्यता कानून 2006 और भूमि अधिग्रहण 2013 का साफ उल्लंघन है l
कांग्रेस ने अपने जन घोषण पत्र में अनुसूचित क्षेत्र में प्रशासकीय ढांचा को संविधान सम्मत बनाने के लिए पेसा कानून का नियम बनाने तथा आदिवासी एवं अन्य वनाश्रित समुदायों का वनाधिकारों की सही कार्यान्वयन करने की दिशा में प्रतिबद्धता को रेखांकित किया था। लेकिन आज लगभग 3 साल के उपरांत न पेसा कानून का नियम बन पाया, और न ही वन अधिकार कानून का सही क्रियान्वयन की दिशा में कोई ठोस पहल दिख रही है।
आज खेती-किसानी का संकट समूची ग्रामीण आबादी के संकट में बदल रहा है। किसान आत्महत्याओं के मामले में छत्तीसगढ़ आज भी देश में 5वें स्थान पर है। इस समय प्रदेश में किसान रासायनिक खाद की कमी से जूझ रहे है, जिसके लिए केंद्र की मोदी सरकार भी जिम्मेदार है, जिसने जरूरत और मांग के हिसाब से खाद की आपूर्ति करने से इंकार कर दिया है।
धरना प्रदर्शन में छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन सहित जिला किसान संघ राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (मजदूर कार्यकर्त्ता समिति), आखिल भारतीय आदिवासी महासभा, जन स्वास्थ कर्मचारी यूनियन, भारत जन आन्दोलन, हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति (कोरबा, सरगुजा), माटी (कांकेर), अखिल भारतीय किसान सभा (छत्तीसगढ़ राज्य समिति) छत्तीसगढ़ किसान सभा, किसान संघर्ष समिति (कुरूद) आदिवासी महासभा (बस्तर), दलित आदिवासी मंच (सोनाखान), गाँव गणराज्य अभियान (सरगुजा) आदिवासी जन वन अधिकार मंच (कांकेर) सफाई कामगार यूनियन, मेहनतकश आवास अधिकार संघ (रायपुर) जशपुर जिला संघर्ष समिति, राष्ट्रिय आदिवासी विकास परिषद् (छत्तीसगढ़ इकाई, रायपुर) जशपुर विकास समिति, पेंड्रावन जलाशय बचाओ किसान संघर्ष समिति (बंगोली, रायपुर) , रिछारिया केम्पेन, भूमि बचाओ संघर्ष समिति (धरमजयगढ़) संगठनों के प्रतिनिधि एवं आदिवासी, किसान, मजदूर शामिल होंगे।
