रायपुर। राजधानी के टैगोर नगर में स्थित पटवा भवन में चल रहे चतुर्मास कार्यक्रम में पहुंचे अर्हम विज्जा के प्रणेता ऋषि प्रवीण म.स ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहा कि यह उनका पहला रायपुर प्रवास है, भगवान श्रीराम का ननिहाल है। इससे पहले वे जोधप में थे। उन्होंने आगे कहा कि सोशल मीडिया आज कब्जा जमाया है उसने रिश्ते और नाते को भी पीछे छोड़ दिया है इसमें सबसे बड़ा योगदान कोई दिया है तो वह है मोबाइल फोन आज के बच्चे मोबाइल के बिना कुछ भी नहीं करते यहां तक कि वे मोबाइल देखेंगे नहीं तब तक खाना भी नहीं खाते है।
उन्होंने कहा कि माताओं को कैसे सुधारें इसी पर हम दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन पटवा भवन में शुरू करने जा रहे हैं जिसमें रायपुर के 1000 और बाहर से 3000 ट्रेनर उन्हें ट्रेनिंग देंगे। यह ट्रेनिंग कार्यक्रम विगत कई वर्षों से चलाया जा रहा है और इसका फायदा भी होता दिख रहा है। इस ट्रेनिंग कार्यक्रम में सिर्फ माता-पिता ही शामिल हो सकते
और उन्हें इस दौरान यह सिखाया जाता है कि वह अपने गर्भ में पल रहे बच्चों को माह में वह सबकुछ सिखा सकती हैं। जो वह उसे सिखाना चाहती है।
माता जब गर्भ में होती हैं तो गर्भ में पल रहे नवजात शिशु को 9 माह के दौरान वह सबकुछ सकती है जो वह उसे सिखाना चाहती है। जब माता-पिता शिक्षित होंगे तो संतान भी शिक्षित होगी। बच्चों को मारने व डांटने से नहीं प्यार से समझाया जाता है, जितना उन्हें मारोगे-डांटोंगे उनके स्वभाव में उतना ही बदलाव आएगा और आगे चलकर माता-पिता को ही पछतावा होता है।







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बच्चों को भी सुधार सकती है। उन्होंने पत्रकारों के सवाल के जवाब में कहा कि दो दिन का यह शिविर निःशुल्क नहीं है, क्योंकि जब हम किसी से ज्ञान प्राप्त करने जाते है तो उसे शुल्क देते हैं। ठीक उसी प्रकार यह भी है जैन साधु-संत कभी शुल्क नहीं लेते लेकिन इस कार्यक्रम में जो ट्रेनर हैं उन्हें तो इसकी जरूरत पड़ती है इसलिए यह शुल्क लिया जा रहा है। उन्होंने विश्व हिंदू परिषद के प्रवीण तोगड़िया से बातचीत की थी कि हिंदू धर्म के धर्म गुरुओं को भी तनख्वाह मिलनी चाहिए। इसके अलावा इन धर्म गुरुओं को यह भी ट्रेनिंग दी जानी चाहिए कि हिंदुओं को वे जागरूक कर सके लेकिन फ्री को सेवा होने के कारण वे इसमें ध्यान नहीं दे रहे है और धर्म परिवर्तन हो रहा है। अगर साधु-संत चाहे तो इसे रोक सकते हैं क्योंकि उनकी कही बातों को लोग सुनते और मानते भी हैं।
