रायपुर . राजधानी वासियों को कल भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिये का दर्शन करने का अवसर मिलेगा। पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिये को राजधानी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर में लाया गया है। कल सुबह 10: 30 से 11 बजे भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिये को पूजा अर्चना के पश्चात शहर में भक्तों के दर्शन के लिये निकाला जाएगा। भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिये को शहर के सभी वार्डों में चौक -चौराहे,गली मोहल्ले में रथ को घुमाया जाएगा । इसके साथ रथ राजभवन ,मुंख्यमंत्री निवास ,कलेक्टोरेट परिसर ,जेल में भी घुमाया जाएगा। उक्त बातें आज विधायक पुरंदर मिश्रा ने पत्रकारों को जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जो भक्त पुरी भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने नहीं जा सकते उन भक्तों को भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिये का दर्शन कराया जाएगा।
विधायक मिश्रा ने भगवान जगन्नाथ के रथ के विषय में बताया की- जगन्नाथ जी के रथ को नंदीघोष, बलभद्र जी के रथ को तलध्वजा एवं सुभद्रा जी के रथ को दर्पदलना कहा जाता है। जगन्नाथ जी के रथ में 16 बलभद्र जी के रथ में 14 एवं सुभद्र जी के रथ में 12 पहीये होते है। जगन्नाथ जी के रथ को बनाने में 832, बलभद्र जी के रथ को बनाने में 763 एवं सुभद्रा जी के रथ को बनाने में 553 लकड़ी के तुकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। जगन्नाथ जी के रथ की उंच्चाई 44.02 फीट बलभद्र जी के रथ की उंच्चाई 43.03 फीट एवं सुभद्रा जी के रथ की उंच्चाई 42.03 फीट होती है। जगन्नाथ जी के रथ का छत्र लाल/पिला, बलभद्र जी के रथ का छत्र लाल / हरा/नीला एवं सुभद्रा जी के रथ का छत्र काला रंग का होता है। जगन्नाथ जी के रथ के अभिभावक गरूड़, बलभद्र जी के रथ के अभिभावक वासुदेव एव सुभद्रा जी के रथ के अभिभावक जमदुर्गा होते है। जगन्नाथ जी के रथ को हर वर्ष नया बनाया जाता है। रथ को बनाने में कभी भी किल या लोहे अथवा किसी भी धातु का इस्तेमाल नही किया जाता है। रथ को बनाते वक्त लकड़ी काटने के लिए पहला वार सोने की हथौड़ी से लगाया जाता है। रथ को खींचने के लिए नारियल के रस्सियों का इस्तेमाल होता है। रथ को बनाने में लगभग 2 महीने का समय लगता है इस दौरान रथ को बनाने वाले कारीगर दिन में सिर्फ एक बार ही सादा भोजन ग्रहण करते है। पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में मान्यता है कि जगन्नाथ जी की रथ यात्रा का फल सौ यज्ञों के फल के बराबर है, रथ की रस्सी को छुने मात्र से ही पापों का क्षय होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है यही वजह है कि रथ यात्रा में हर साल देश विदेश से लाखो श्रद्वालु पुरी पहुंचते है।
[1:28 क्करू, 2/10/2024] त्रशशस्र रुह्वष्द्म: जय जगन्नाथ
चारो धामों में से एक सुप्रसिद्ध जगन्नाथ धाम पुरी मंदिर स्थापित महाप्रभु जगन्नाथ जी का इतिहास बहूत ही अदभुत है, माना जाता है कि भगवान विष्णु का हृदय आज भी पुरी के मंदिर में स्थित काष्ठ की प्रतिमाओं में धडक़ रहा है। इस मंदिर में स्थापित प्रतिमाओं का इतिहास है पुरी के तातकालीन राजा इन्द्रदुम्न को सपने में एक झलक दिखी थी की समुद्र तट पर एक विशाल काय लकड़ी का तुकड़ा तैर रहा है जिसे वो लाए और उसकी प्रतिमा बना कर उसे मंदिर में स्थापित कर उसकी पूजा करें उत्सतापूर्वक अगली सुबह राजा समुद्र किनारे गये और वहां उन्हें सच में एक महानीम लकड़ी को तुकड़ा मिला जिसे राजा अपने महल ले आए। (लकड़ी के उस तुकड़े को आज ब्रम्ह दारू के नाम से जाना जाता है)
आधी बनी प्रतिमा की कहानी :






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लकड़ी का तुकड़ा तो मिल गया था पर उसे मूर्त रूप देने वाला कोई नही मिल रहा था, राजा ने राज्य के शिल्पकारों को बुलाया और मुर्ति बनाने को कहा पर किसी ने भी उस तुकड़े को विच्छेदित नही कर पाया, यह देख कर राजा बहुत उदास हो गया था उसी समय स्वयं विश्वकर्मा भगवान बुढ़े बढ़ाई के रूप में प्रकट हुए और उन्होने लकड़ी से भगवान नीलमाधव की मूर्ति बनाने की बात कही पर उन्होने सत्र रखी की वे 21 दिन में उस मूर्ति को बना देंगे पर इस दौरान वो अकेले ही रहेंगे मूर्ति बनाते वक्त उन्हें कोई देख नही सकता, राजा को उनकी यह शर्त माननी पड़ी। कुछ दिन तो कमरे के अंदर से आरी, छीनी और हथौड़ी की आवज आती रही पर बाद में वो आवज बंद हो गयी राजा इंद्रदुम्न और रानी गुंडीचा अपने आपको मूर्ति बनते हुए देखने से रोक नही पाये कमरे के अंदर से कोइ भी आवाज न आने पर उन्हें लगा की बुढ़ा बढ़ाई भुख प्यास से मर गया होगा यह सोचकर जिज्ञासा पूर्वक उन्होने दर्वाजा खोलने का आदेश दे दिया जैसे ही कमरा खुला बुढ़ा व्यक्ति गायब था और वहां राजा को अर्ध निर्मित तीन मुर्तियां मिली। जगन्नाथ जी और उनके भाई के छोटे-छोटे दो हाथ बने थे पर पांव नही बने थे जबकी बहन सुभद्रा के हाथ और पांव दोनो ही नही बने थे, राजा ने इसे ही भगवान की इच्छा मानकर उन्ही अधुरी मूर्तिओं को मंदिर में स्थापित कर दिया तब से लेकर आज तक तीनों भाई बहन इसी रूप में मंदिर में विद्यमान है।
