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11 बजे वाली बस और चंचल की चंचलता

Purushottam Manhare September 20, 2022

प्रफुल्ल को आज घर से निकलने में थोड़ी देर हो गई थी दौड़ते दौड़ते उसको बस पकड़ना पड़ा था। चूँकि 11 बजे के बाद फिर सीधे 2 बजे बस आती थी इसलिए 11 बजे वाली बस सभी के लिए अनुकूल होता शहर जाने के लिए। प्रतिदिन पढ़ने वाले बच्चो के अलावा अपने निजी कार्याे से जाने वाले ग्रामीण भी इसी बस से जाते और शाम को 5 बजे पुनः इसी बस से वापस गाँव आ जाया करते थे। प्रफुल्ल रोजाना अपने स्कूल जाने के लिए 11 बजे की बस लेता था जो मुझे मेरे स्कूल शुरू होने से 15 मिनट पहले 11ः30 में पंहुचा देती थी फिर 11ः45 बजे से उसका स्कूल शुरू हो जाता था।
प्रफुल्ल के बस स्टॉप से 3 किलोमीटर दूर पर ही उसकी स्टॉप थी उसकी कौन उसकी अर्थात जिनको देखकर प्रफुल्ल प्रफुल्लित हो उठता, उसके चेहरे पर रौनक आ जाती थीं अर्थात चंचल, चंचल भी समान कक्षा में कन्या शाला की छात्रा थी जो प्रफुल्ल वाली बस से ही स्कूल जाती थी। प्रफुल्ल और चंचल एक निजी विद्यालय में पढ़ते थे। आगे 9 किलोमीटर का सफ़र कब खत्म हो जाता था उसे पता ही नहीं चलता था। दोनों प्रतिदिन बस से साथ ही जाते थे लेकिन वापसी में अलग अलग क्योंकि चंचल की कक्षा 4 बजे समाप्त होती एवं प्रफुल्ल की कक्षा 4ः30 बजे। यूँ तो न ही प्रफुल्ल ने कभी चंचल से बात किया और न ही चंचल कभी प्रफुल्ल से बात कर पाये लेकिन इशारों ही इशारों में वे दोनों विज़ुअल कॉम्युनिकेशन का सहारा लेकर एक दूसरे से बात भी कर लेते और हाल भी जान लेते थे। यह सिलसिला करीबन साल भर चला। चंचल के चेहरे पर अलग ही रौनक होती थी। हर कोई जो भी उसको देखता देखकर एक बार मुस्कुरा देता उसका चेहरा हमेशा मुस्कुराता ही रहता था। चेहरे पर चंचलता के साथ ही एक अलग ही सकारात्मक मुस्कान की धनी थी वह। सुबह-सुबह जब स्कूल के लिए निकलते तो कक्षा का होमवर्क ना करने से शिक्षक का छड़ी खाने का जो डर प्रफुल्ल के मन में होता, वह चंचल की एक झलक मात्र से दूर हो जाती थी।गांव की सड़कों का तब गड्ढों और सड़क में अलग ही मेल होता था। गड्ढों से भरी सड़कें और उसपर चलने वाली पुरानी बसें और उसपर बज रहे 80 और 90 के दशक के पुराने गीत जब कुमार सानू, सोनू निगम, जगजीत सिंह, फाल्गुनी पाठक के गीतों की तो जैसे सी झड़ी लगी रहती थी। उन पुरानी गीतो के बोल से ही चंचल और प्रफुल्ल की बातें हो जाती थीं। पुराने गीतों के बोल होते थे, उसके भाव को महसूस करते हुए रोज स्कूल जाते और स्कूल से घर आते थे, यही दिनचर्या चलती रहती थी। गांव में तब बसें बहुत कम चला करती थीं क्योंकि सड़कें उतनी अच्छी नहीं होती थी जिससे कि लगातार बसें चल सकेें, इसलिए बहुत पुरानी खटारा बसें ज्यादा चलती थी। कम बसों के चलने से बसो में खचाखच भीड़ होती थी इतनी की पैर रखने की जगह नहीं होती थी। लेकिन प्रफुल्ल सोचता था कि जो बस के कंडक्टर होते हैं उनको कोई पुरस्कार दिया जाए क्योंकि कंडक्टर बस में भीड़ कितनी भी हो खिड़की से घुस जाते और पीछे से जगह बनाते हुए ज्यादा से ज्यादा सवारियां बैठाते रहते। उस सवारियों से खचाखच भरी हुई बस में बच्चे जो ज्यादातर स्कूली बच्चे होते थे, उनको मजबूरी में खड़े होकर ही जाना-आना पड़ता था। इसलिए भी उनको खड़े होकर ही यात्रा करना पड़ता था क्योंकि स्कूली बच्चे पूरा भाड़ा नहीं देते थे। प्रफुल्ल के गांव से स्कूल तक की दूरी 12 किलोमीटर की थी और उस समय किराया वास्तविक किराया 10 रूपये होता था, जिसमें से स्कूली बच्चे 5 रूपये ही किराया देते थे। बाकी के 5 रूपये नहीं देने के कारण से उनको बस में खड़े होकर सफर करना पड़ता था और भीड़ से खचाखच भरी इस बस में खड़े होकर सफर करना उनके लिए बहुत कष्टदायक होता था। उस समय अक्सर कुछ असामाजिक लोग भी उन बसों में सफर करते थे, कई शराबी भी होते थे तो कई ऐसे भी होते थे जो लड़कियों को या फिर महिलाओं को गलत तरीके से और छूने की कोशिश करते थे। इन कठिनाइयों का सामना करते हुए वे बच्चे प्रतिदिन बस में सफर करने को मजबूर होते थे क्योंकि तब उनके पास और कोई विकल्प नहीं होता था। पढ़ाई भी जरूरी होती थी और पढ़ाई के लिए सफर भी जरूरी था। चंचल बहुत ही मासूम और उतनी ही चंचल भी थी। वो चंचलता के साथ ही पढ़ने में भी बहुत होशियार प्रतीत होती थी। उसके सहपाठी लोग हमेशा उसकी तारीफ करते थे। धीरे-धीरे प्रफुल्ल उसके बारे में जानने का इच्छुक होते गया और पता चला कि सात बहनों में वह सबसे बड़ी थी। उसके पिताजी एक पान का ठेला चलाते थे और गांव में उनकी कुछ जमीन थी जिस पर साल में धान की एक फसल ही लेता था। इसके अलावा पान ठेला से जो भी आमदनी होती थी उसी से उनका घर का खर्चा चलता था। बड़ी बेटी होने के नाते बेटी चंचल को उसका पिता शासकीय कन्या विद्यालय में पढ़ा रहा था, लेकिन उसके पिताजी को शराब पीने की एक बुरी लत थी। उसकी इस बुरी लत ने लड़की चंचल के जीवन को तबाह कर दिया। तबाह इसलिए कर दिया कि जैसे ही वह लड़की 12वीं कक्षा पास की उसके पिताजी ने उसका विवाह कर दिया। 18 वर्ष की उम्र में ही उसका विवाह हो गया जोकि दुखद था। चंचल और प्रफुल्ल का सफर बस सोमवार से शनिवार सुबह 11ः00 बजे प्रारंभ होकर आधे घंटे में पूरा हो जाता। यह सफर लगातार 1 साल चला ना उनके बीच दोस्ती हुई और ना ही वे दोनों कभी एक दूसरे से बात किए। लेकिन यह जो सफर था यह प्रफुल्ल के जीवन का पहला एहसास था, ऐसा एहसास जो प्रफुल को अपने विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षित कर रहा था। बिना कोई रिश्ता के बिना कोई वार्तालाप के ही प्रफुल उसकी तरफ खींचा चला जाता था। यह एहसास 16-17 वर्ष की उम्र के हर बच्चे में होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसे प्यार नहीं झुकाव कह सकते हैं, जो इस उम्र में लाजमी है। लेकिन जो इस झुकाव को पार कर गया और शिक्षा के महत्व को समझते हुए शिक्षा पर ध्यान केंद्रित कर लिया तो उसकी दुनिया में आगे कई चंचल मिलेंगी जो हर प्रफुल्ल के जीवन में चंचलता एवं खुशियां भए देगी। आज टूटी-फूटी सड़कों की जगह चमचमाती सड़कें हैं और जहां दिन में तीन चार बसें चलती थी वहां पर कई बसें और ऑटो की भरमार सी हो गई है। जैसे-जैसे तकनीकी विकास हुआ, समाज का विकास व सड़कों का विकास हुआ वैसे वैसे विद्यालयों का भी विकास हुआ लेकिन जो सामाजिक विकास है वह अभी भी पिछड़ा हुआ है। बच्चे अब लोक शिक्षा के महत्व को नहीं समझ रहे हैं। एक बेटे की चाह में जहां पर 7 बेटियां पैदा कर लिए और आगे के पालन पोषण से बचने के लिए बहुत ही कम उम्र में बेटियों की शादी कर दी गई। यह घटना आज भी वर्तमान में विद्यमान है और इसके पीछे का कारण है अशिक्षा, शिक्षा से दूर रहने का ही खामियाजा जो है, बेटियों को ही भुगतना पड़ता है। इसके लिए हम बेटों को भी आगे आने की जरूरत है और शिक्षा को सभी के लिए समान करने की जरूरत है। सही उम्र में सही शिक्षा के साथ ही सही उम्र में ही विवाह होना चाहिए, यह हर मनुष्य का अधिकार है और इसके लिए समाज के प्रबुद्ध लोगों को चिंतन -मनन करना होगा और गंभीरता से सोचना होगा ताकि समाज को अनेक अभिशापों का दंश झेलने से बचाया जा सके।

*बलवंत सिंह खन्ना*
स्वतन्त्र लेखक, कहानीकार

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