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नायलॉन की चड्डी और हाफ कमीज के अलावा तब कोई स्कूल ड्रेस नहीं हुआ करता था*

Purushottam Manhare November 2, 2022

 

अभी तो गाँव की गली में धूल मिटटी से खेलने की उम्र थी। वैसे तो बलवंत सभ्य परिवार से ताल्लुक रखता था लेकिन अगर 90 के दशक वाला बचपन देखोगे तो आपको लगेगा कि बलवंत अल्हड़ देहाती था । था क्या आज भी देहाती ही है। हाँ देहाती को आप किस पैरामीटर में नापते हैं मुझे नहीं पता, लेकिन उस समय शासकीय प्राथमिक स्कूल जाना और स्कूल के बाद बचे हुए समय में पूरे गांव भर कीे गलियों में घूम-घूम कर खेलना कूदना यही तब की दिनचर्या होती थी। ना कोई चिंता ना कोई डर ना कोई घबराहट। छोटा सा गांव होने के कारण पूरे गांव की बस्ती में घूम आते थे। ना माता-पिता को चिंता होती थी और न ही बच्चों को। तब बलवंत पहली कक्षा में नायलॉन की चड्डी और हाफ कमीज पहनकर स्कूल जाया करता था। गांव में तब कई बच्चे ऐसे भी थे जो कक्षा तीसरी, कक्षा चौथी तक नायलॉन की चड्डी और हाफ कमीज का उपयोग करते थे इसमें अमीरी गरीबी वाली कोई तर्क नहीं थी। तब उस समय में कोई यूनिफॉर्म नहीं हुआ करता था, ना ही उनको लेने के लिए कोई बस आती थी। केवल एक बोरी का थैला और बोरी के थैले में एक और बोरी का चटाई होती। उसी चटाई पर बैठकर पढ़ाई करते थे। तब गांव में खेल कूद और पढ़ाई की यही दिनचर्या होती थी। उस दिन स्कूल में छुट्टी का दिन था, रविवार के दिन सुबह से बलवंत खेलने कूदने में मस्त था। दिनभर बाटी खेलना और दोपहर खाने के समय जब भूख लगी तब घर पहुंचा। घर पहुंचा तब माँ ने बेलन आदि से स्वागत किया तब के समय बच्चों को समझाने के लिए मां का सबसे पसंदीदा हथियार हुआ करता था चौकी बेलन। दिन में दो से तीन बार तो उससे बच्चों की खातिरदारी होना मानो तय था । जितना बच्चे रोटी नहीं खाते थे उससे कहीं ज्यादा बेलन से मार खा लेते थे। बलवंत ने गांव में ही नवमीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी की, उसके बाद शहर की तरफ रुख किया। कक्षा 12 के बाद 2007 में 18 साल की उम्र में स्नातक की पढ़ाई के लिए छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कृषि अभियांत्रिकी में दाखिला लिया। दाखिला लेने के 2 साल बाद ही तत्कालीन छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा प्रारंभ की गई पायलट प्रशिक्षण योजना के बारे में जानकारी प्राप्त हुई। पायलट प्रशिक्षण योजना अर्थात हवाई जहाज का पायलट। इत्तेफाक ही रहा कि इस योजना में आवेदन जमा करने के बाद बहुत जल्दी परीक्षा भी सम्पन्न हो गई। परीक्षा परिणाम में सफलता मिलने के बाद साक्षात्कार एवं शारीरिक परीक्षण के उपरांत बिलासपुर के चकरभाठा विमानतल में प्रशिक्षण भी प्रारम्भ हो गया।

“बचपन में अपने गांव से कभी कभार आसमान मंे उड़ते हवाई जहाज़ को देख कर मैं बहुत ख़ुश हो जाता था। जब पायलट प्रशिक्षण की बात सुनी तो आप सोच नहीं सकते कि बलवंत कितना ख़ुश हुआ था।”
बलवंत ने कृषि विश्वविद्यालय की अपनी पढ़ाई छोड़ी और पायलट प्रशिक्षण में शामिल हो गया, लेकिन एक दिन राज्य सरकार ने अचानक प्रशिक्षण योजना बंद कर दी।
विमान चालक का प्रशिक्षण लेना गरीब तबके के लिए बेहद कठिन होता है। इसमें शारीरिक और मानसिक दक्षता के साथ ही साथ अत्यधिक आर्थिक लागत भी लगती है। 2007 में छत्तीसगढ़ की तत्कालीन सरकार ने ग़रीब और पिछड़े वर्ग के तबके के युवाओं के लिए पायलट प्रशिक्षण योजना शुरू की थी।
सरकार ने दिल्ली की साईं फ़्लाईटेक एविएशन नामक कंपनी के साथ क़रार किया और बाक़ायदा परीक्षा आयोजित कर के हज़ारों ग़रीब नौजवानों में से योग्य प्रतिभागियों को डेढ़ साल के प्रशिक्षण के लिए चुना।
हरेक प्रशिक्षु पायलट के लिए सरकार ने तब लगभग 14 लाख रुपए का भुगतान कंपनी को किया।
पायलट प्रशिक्षण के लिए चुने गए नौजवानों की आंखों में भविष्य के सुनहरे सपने थे और उस सपने के सच होने का पूरा भरोसा।
लेकिन कुछ ही समय पश्चात तत्कालीन राज्य सरकार की इस योजना ने दम तोड़ दिया और हर साल पायलट प्रशिक्षण योजना में चुने जाने वाले नौजवानों के चांद-तारों को छूने के सपने तार-तार हो गए।
तब पड़ोसी राज्य झारखंड से भी 30 बच्चों को प्रशिक्षण के लिए छत्तीसगढ़ के चकरभाठा विमान तल पर संचालित साई फ्लाईटेक एविएशन भेजा गया था लेकिन उन बच्चों का भी प्रशिक्षण अधूरा ही रह गया। लेकिन तब की झारखण्ड सरकार ने उनके लिए वैकल्पिक व्यवस्था तत्काल ही उत्तरप्रदेश के सुल्तानपुर पायलट प्रशिक्षण केंद्र में कर दिया था। लेकिन छत्तीसगढ़ के प्रशिक्षु बच्चे अधर में ही लटके रहे। उनकी समस्या न सरकार ने सुनी न ही प्रशासन ने।
तब राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह भी गाहे-बगाहे अपने भाषणों में पायलट प्रशिक्षण योजना का उल्लेख करते रहे लेकिन हालत ऐसे हो गए थे कि बंद हो चुकी प्रशिक्षण योजना के पूरे दस्तावेज़ भी सरकार के पास उपलब्ध नहीं थे। यहां तक कि प्रशिक्षण ले रहे पूरे बच्चों की संख्या और नाम-पता भी विभाग के पास नहीं हैं।
वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने विगत दिनों मुख्यमंत्री के मंशानुरूप स्कूली बच्चों को जो 12वीं कक्षा में प्रावीण्यता हासिल किये उनको हेलीकॉप्टर की सैर करवाई गई निश्चित ही इससे प्रदेश के बच्चों में पढ़ाई और भविष्य को लेकर सकारात्मकता आई है। लेकिन हवाई जहाज़ उड़ाने का प्रशिक्षण अधूरा छोड़ चुके नौजवानों को सरकारी उम्मीद हवा-हवाई ही लग रही है। वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य सरकार, प्रदेश, संस्कृति, खेल-कूद को संरक्षण एवं बढ़ावा देने के लिए बेहतर कार्य कर रही है। जिस प्रकार से छत्तीसगढ़िया ओलम्पिक का आयोजन किया जा रहा है जहां एक गिल्ली डण्डा और बाटी भंवरा खेलने वाला देहात से निकला बच्चा गौरव साली कार्य पायलट प्रशिक्षण प्राप्त कर सकता है। जहाँ एक बाटी भवरां खेला हुआ व्यक्ति प्रदेश का मुखिया बन सकता है, ऐसा प्रदेश में वर्तमान प्रदेश सरकार अगर अधूरे रह गए पायलट प्रशिक्षण को पूर्ण कराकर इस योजना को पुनः प्रारम्भ कर सकें तो इससे प्रदेश के गरीब परिवार के बच्चों के जीवन में खुशियां लाई जा सकती हैं। प्रदेश में अभी कुल कितने पायलट हैं और हैं भी तो अनुसूचित जाति जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग से या फिर गरीब परिवार से कितने हैं इसका उत्तर शायद आपको आश्चर्य कर दे इसलिये इसपर मैं बात नहीं करूँगा। वर्तमान में देखा जाये तो प्रदेश सरकार के पास घरेलू विमानतल भी 4 से अधिक तैयार हैं जहाँ मामूली लागत में पायलट प्रशिक्षण कराया जा सकता है। इसपर सरकार को अवश्य सोचना चाहिए ताकि और कोई बलवंत का सपना अधूरा न रहे।

बलवंत सिंह खन्ना
लेखक एवं कहानी का पात्र

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Tags: NewsRaipur

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