रायपुर
भगवान श्री राम के जीवन चरित्र का सम्बन्ध जैन 20 वे तीर्थंकर श्री मुनि सुव्रतनाथ भगवान के तीर्थं काल मे हुआ था उसी समय राजा श्रीपाल जिनके पिता हरिदमन थे उन्होंने न्याय नीति सें राज्य का संचालन करते हुए श्रीपाल को राज्य सौप कर स्वयं वानप्रस्थ आश्रम को प्राप्त हुए राजा श्रीपाल ने अनेक वर्षो तक कुशल राज्य का संचालन किया किन्तु उन्हें पूर्व भव मे धर्म एवं मुनियो की निंदा के कारण उनको तथा उनके साथ सात सौ राज्य अधिकारीयो आदि को गलित कुष्ठ रोग हो गया जिसके दुष्प्रभाव सें प्रजा मे दुख और अशांति थी उसको ध्यान मे रखते हुए न्याय प्रिय रहा श्रीपाल अपने 700 रोगियों के साथ वन मे जाकर निरोग होने की प्रतीक्षा करने लगे अपने राज्य को अपने चाचा को सौप कर भगवान की आराधना करने लगे उसी मध्य राजा पहुप पाल की दो सुन्दर बेटियां एक मैना सुंदरी दूसरी सुर सुंदरी एक भाग्य पर विश्वास करती दूसरी कर्म प्रधान थी बेटी की शादियो के लिए इच्छा जानना चाही तो बड़ी बेटी मैना सुंदरी ने कहा पिता जी आप जैसा वर चाहे उस वर के साथ हमारी शादी करवाये ये हमारी भारतीय संस्कृति की परम्परा है क्रोध मे आकर पिता जो भाग्य प्रधान परम्परा सें द्वेष रखने वाले थे पिता ने कुष्ठ रोगी श्री पाल सें शादी करवाई इस परनीति को देख कर पूरा नगर दुखी हुआ मैना सुंदरी ने पिता की आज्ञा मान कर शादी स्विकृत की जैन तीर्थ यात्रा कर मुनियो की आज्ञा का पालन कर श्री सिद्ध चक्र विधान के माध्यम सें कुष्ठ रोग रहित श्रीपाल के साथ सभी को पूर्णतः स्वस्थ किया तब सें लेकर आज तक प्रत्येक जैन मंदिरो मे श्री सिद्ध चक्र विधान की परम्परा चली आ रही है जो हमारे भारतीय संस्कृति के लिए बेटी दामाद के भाग्य की सराहना होती है और लोग अपनी संस्कृति के प्रति विश्वास रखते है 8 दिवसीय विधान मे सिद्ध प्रभु की आराधना जैन पद्धति सें कर के अपने भविष्य की सरहाना सभी जैन करते है अष्टहानिका पर्व पर श्री सिद्ध चक्र विधान का विशेष महत्त्व जैन शास्त्रों मे बताया गया है बड़े मंदिर के अध्यक्ष संजय नायक जैन ने बताया की बड़े मंदिर मे हो रहे विधान मे आज कुल 550 अर्घ चढ़ाये गए है जिसमे समाज के सभी धर्म प्रेमी बंधु धर्म लाभ ले रहे है दिनांक 2 जुलाई को विश्व शांति हेतु हवन रखा गया है जिसकी समाप्ति 3 जुलाई को विधान समाप्ति के साथ होंगी






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