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  • एसीआई में दिल की अनियमित धड़कन का थ्रीडी- इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी के जरिये रेडियो फ्रीक्वेंसी एब्लेशन विधि से सफल उपचार*
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एसीआई में दिल की अनियमित धड़कन का थ्रीडी- इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी के जरिये रेडियो फ्रीक्वेंसी एब्लेशन विधि से सफल उपचार*

Purushottam Manhare October 23, 2024

 

*कार्डियोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. स्मित श्रीवास्तव के नेतृत्व में 70 वर्षीय मरीज के दिल का इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी के द्वारा नक्शा बनाकर, वेन की चौखट को जलाकर, धड़कन को किया कंट्रोल*

*रायपुर. 23 अक्टूबर 2024.* पंडित जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय रायपुर से संबद्ध डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय स्थित एडवांस कार्डियक इंस्टीट्यूट में 70 वर्षीय बुजुर्ग के अनियमित दिल की धड़कन को थ्रीडी- इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी विधि से रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन प्रक्रिया के जरिये उपचार कर धड़कन को नियमित किया गया। कार्डियोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. स्मित श्रीवास्तव के नेतृत्व में संपन्न हुए इस प्रोसीजर में अनियमित दिल की धड़कन के कारण दिल के बायें चैम्बर के वेन की चारों दिशाओं में हुए ब्लॉकेज को थ्रीडी- इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी मैपिंग के जरिए रेडियो फ्रीक्वेंसी एब्लेशन विधि से जलाया गया और धड़कन को नियमित किया गया।

अम्बेडकर अस्पताल के अधीक्षक डॉ. संतोष सोनकर इलाज करने वाली पूरी टीम को बधाई देते हुए कहते हैं ; एडवांस कार्डियक इंस्टीट्यूट, हृदय से संबंधित बीमारियों के उपचार की दिशा में निरंतर नई उपलब्धियां दर्ज कर रहा है। एसीआई इस बात का प्रमाण है कि शासकीय अस्पताल इलाज के मामले में किसी से कम नहीं है। हृदय से जुड़ी कई जटिल बीमारियों का इलाज सफलतापूर्वक एसीआई में किया जा रहा है। इस विभाग ने शासकीय अस्पताल के रूप में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थान को एक अलग पहचान दिलाई है। एसीआई में हुए कुछ उपचार ने विश्व रिकार्ड भी बनाए हैं।

डॉ. स्मित श्रीवास्तव के अनुसार, 70 वर्ष से अधिक उम्र के हर चौथे व्यक्ति को एट्रियल फिब्रिलेशन होने की समस्या हो सकती है। इसमें हार्ट अच्छे से कॉन्ट्रैक्ट नहीं करता या संकुचित नहीं हो पाता। तो हार्ट का जो ब्लड है, वो रुका रहता है और उसमें थक्के बन जाते हैं। यही थक्के ब्रेन में चले गये तो उससे लकवा हो जाता है। इसमें यह पाया गया है कि बाएं तरफ के हार्ट के ऊपर वाले चैम्बर में चार अलग-अलग दिशाओं से वेन्स आती हैं, जो ब्लड लेकर आती है। उन वेन्स से ही 90 से 95 प्रतिशत एट्रियल फिब्रिलेशन की बीमारी होती है। यदि उनके दरवाजों या चौखट को जला दिया गया तो चारों तरफ से यह समस्या खत्म हो जाती है। शासकीय अस्पतालों में अम्बेडकर अस्पताल स्थित एसीआई ही एकमात्र वो संस्थान है जहां थ्रीडी इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी विधि से एट्रियल फिब्रिलेशन के उपचार की सुविधा उपलब्ध है। इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी मैपिंग के जरिए हृदय की विद्युत गतिविधि का पता चलता है। मनुष्य के शरीर में भी प्राकृतिक विद्युत आवेग या तरंग उत्पन्न होते हैं जो दिल के धड़कन को एक निश्चित रिदम या लय में धड़काते हैं।

*ऐसे किया गया प्रोसीजर*
डॉ. स्मित श्रीवास्तव के अनुसार इस प्रोसीजर में मरीज के उपचार के लिए सबसे पहले दिल के इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी का बिंदु-बिंदु करके का त्रि-आयामी नक्शा बनाया गया जिसे थ्रीडी-इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी मैपिंग कहते हैं। उसके बाद रेडियो फ्रीक्वेंसी एब्लेशन के माध्यम से उच्च ऊर्जा युक्त रेडियो तरंगों के जरिए ब्लॉकेज को जलाया गया जिससे एट्रियल फिब्रिलेशन नार्मल हो गया। वेन के माध्यम से जो खून की सप्लाई का रास्ता है वहां ब्लॉकेज के कारण चौखट जैसी स्थिति बन जाती है जिसको बिंदु-बिंदु करके साउंड वेब से जला देते हैं और एक पूरा सर्कल बना देते हैं जो चारों तरफ से पल्मोनरी वेन को आइसोलेट कर देते हैं जिससे उनका सम्पर्क मेन चेम्बर से टूट जाता है और धड़कन कंट्रोल हो जाती है। इस प्रक्रिया को पल्मोनरी वेन आइसोलेशन कहते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को अम्बेडकर अस्पताल के दो विभागों ने मिलकर एक साथ अंजाम तक पहुंचाया। इसके लिए कार्डियोलॉजी विभाग से डॉ. स्मित श्रीवास्तव के साथ डॉ. कुणाल ओस्तवाल, डॉ. शिव कुमार शर्मा एवं एनेस्थिसियोलॉजी विभाग से डॉ. जया लालवानी ने अपनी मुख्य भूमिका निभाई। यह एक बहुत ही सावधानीपूर्वक किया जाने वाले प्रोसीजर है जिसके पहले मरीज के धड़कन के रिदम को बनाये रखने के लिए एनेस्थिसियोलॉजी विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

*दिल की धड़कन अनियमित होना (ऐट्रियल फिब्रिलेशन)*
दिल की धड़कन अनियमित होने को ऐट्रियल फिब्रिलेशन (आलिंद विकंपन) कहते हैं। यह विकंपन रक्त के सामान्य प्रवाह को बाधित कर सकता है जिससे कारण अनियमित एवं तेज हृदय गति की समस्या उत्पन्न होती है और हृदय में रक्त का थक्का जम जाता है। यह थक्का कई बार दिमाग तक पहुंच जाने से लकवा होने का खतरा बढ़ जाता है। ऐट्रियल फिब्रिलेशन हृदय के ऊपरी कक्ष (एट्रियल) और निचले कक्ष (निलय) के साथ समन्वय से बाहर हो जाते हैं। इसके लक्षणों में दिल की धड़कन बहुत तेज होना, सांस लेने में परेशानी, और थकान जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। एट्रियल फिब्रिलेशन से होने वाली रूकावट के कारण जमने वाली रक्त के थक्कों से स्ट्रोक होने का जोखिम बढ़ जाता है।

लगातार तीन से पांच घंटे मरीज को स्थिर रखने का कमाल – Anaesthesia department ने सम्भव कर दिया

अन्यथा मरीज के हिल जाने से पूरा हार्ट का नक्शा दुबारा बनाना पड़ता
डॉ जया Lalwani मैडम और Anaesthesia की टीम इस प्रक्रिया की असली कारक है

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